दूर्वा - ये घास है बहुत खास।

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हाँ जी!! कैसे हैं आप सब? आज कल थोड़ी व्यस्त रहती हूँ। हर दिन सोचती हूँ की कुछ लिखा जाए। आपसे कुछ हाल बाँट लिया जाए दिल का या फिर कुछ ऐसा जो किसी रूप में आपके काम या सके। पर आज जो बात मैं आप सबसे कहने वाली हूँ उसे पढ़ कर आप हैरान रह जाएंगे।

वैसे भाद्र मास की शुरुआत हो चुकी है। वो अलग बात है की बादलों की घनघोर गूज अभी भी कायम है। वैसे मैं आपको बता दूँ की भाद्र मास के आते ही मेरे मन की उत्सुकता दस गुण हो जाती है। पूछिए क्यों?? अरे पूछ लीजिए, इसमें शर्माना कैसा? हाँ तो बात ऐसी है की इस महीने के आते ही देश भर में त्यौहारों की धूम मच जाती है।

कृष्ण जन्माष्टमी, हरतालिका तीज, कृष्ण छठी और फिर गणेश चतुर्थी, सब तरफ नाच गाना और खुशियों भरा महोल होता है। 

कल जब पूरा देश गणेश चतुर्थी मन रहा था, तो हमारी आयुर्वेद की टीम बार बार एक घास के बारे में बात कर रही थी। ये वो घास है जो श्री गणेश अर्चना में प्रयोग की जाती है। ऐसा कहा जाता है की दूर्वा के बिना यह पूजा सम्पन्न नहीं मणि जाती। इस से जुड़ी बहुत सी पौराणिक कथाएँ है जो मैं आपको अपने अगले ब्लॉग में बताऊँगी। फिलहाल बात करते है उस घास की।

आप में से काफी लोग समझ गए होंगे अब तक, पर चलिए मैं बता देती हूँ की मैं दूर्वा घास की बात कर रही  हूँ। इसे आम भाषा में दूब घास या कुशा भी कहा जाता है। सांस्कृतिक तौर पर इस घास का इस्तेमाल होते मैंने कई बार देखा है पर क्या दूर्वा सिर्फ पूजा में काम आती है? पूजा में इसका इतना महत्व क्यों है? क्या इसके कुछ और भी फायदे हो सकते है? और इसकी पहचान कैसे हो इन सब सवालों के जवाब आज आप सबके
साथ साझा करने जा रही हूँ।

ये दूर्वा घास का ही चित्र है। पारंपरिक तौर पर तो इसका प्रयोग हम करते ही है। आइए जानते है की आयुर्वेद संहिताएँ दूर्वा के बारे में क्या कहती है? दूर्वा को आयुर्वेद में नील दूर्वा, सहस्तरवीर्य, अननंता और शतवल्ली भी कहा जाता है। इसे मधुर, तिक्त और कषाय रस की औषधि कहा गया है जिसका अर्थ है की यह शरीर की गर्मी पर याचा काम करती है। ये तो थी थोड़ी शुद्ध आयुर्वेद की बात। आइए ये जान लेते है हैं की ये किन अवस्थाओं में हुमएन लाभ पहुंचा सकती है।

शीतवीर्य : दूर्वा को शीतवीर्य कहा गया है जिसका अर्थ है की ये शरीर में बढ़ी हुई गरमी को शांत करती है। तप अगर आपको बहुत पसीना आता है, बहुत प्यास लगती है या फिर गर्मी के मारे बुरा हाल हो जाता है तो येऔषधि आपके काम की है।

वर्ण : वर्ण से अर्थ है त्वचा, तो दूर्वा को हम त्वकगा रोगों में भी खूब प्रयोग कर सकतें है। शरीर पर लाल चकते हो, खून बह रहा हो या किसी भी प्रकार का चर्म रोग हो, दूर्वा को पीस कर वहाँ लगा देने से लाभ मिलता है।

स्त्री रोग: ऐसा कहा जाता है की यह स्त्री के गर्भाशय (uterus) को बल प्रदान करने का काम करती है। अगर किसी स्त्री को मासिक धर्म के दौरान अधिक रक्त जाता है तो इसका प्रयोग किया जा सकता है। इसके साथ ही आज कल PCOS/PCOD जैसे समस्याओं में भी इसका प्रयोग औषधियों में किया जाता है।

इनके अलावा यह शरीर में जमी गंदगी को बाहर निकालती है, मोटापे में इस से चिकित्सा की जा सकती है। किसी भी प्रकार की जलन महसूस होने पर भी इसका प्रयोग किया जा सकता है। नेत्र रोगों में सही वैद्य की सलाह से इसका प्रयोग करना अत्यंत कारगर सिद्ध हुआ है।

तो है न ये छोटा पैकेट बड़ा धमाका। देखिए न! यही तो कुदरत का कमाल है की हमारे आस पास की हर वनस्पति कुछ न कुछ औषधीय गुण से भरपूर है। पर क्योंकि यह सब इतनी आसानी से हुमएन प्राप्त है तो हम इन्हे अनदेखा कर न जाने किन सब चीजों के पीछे भागते रहते है।

लेकिन मैं फिर भी यही कहूँगी की क्यों न हम आज से ही शुरुआत करें। क्यों न आयुर्वेद की शरण में हम सब अपने जीवन को स्वस्थ और खुशहाल बनाए।

इस बारे में सोचिएगा जरूर और मैं आपको मिलूँगी अगली बार गणेश चतुर्थी विशेष के साथ। तब तक स्वस्थ रहिए, खुशियां बाँटिए।

Author:Charu Rajpal I Publisher: Kosha Life 

 

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