अमृता प्रीतम: इश्क की चलती फिरती मूरत

Read Time: 2 mins 50 secs 

तो लीजिए मैं फिर से आई हूँ, एक और नया फसाना, एक और गुजरा ज़माना ले कर। आज मैं अपने पिटारे से वो पल चुन कर लाई हूँ जब मुझे पहली दफा किसी शायरा से बेहद लगाव हुआ था। तो बात कुछ साल पहले की  है, शायद 2015 की। तारीखों से मेरा खासा लगाव रहा नहीं कभी इसलिए मैं इनसे गहरे रिश्ते नहीं बनती। खैर, उन दिनों मेरी लेखनी ने जोर पकड़ रखा था और हर रोज ही कुछ न कुछ लिखा जाता था। 

पर जाने क्यूँ मुझे ऐसा महसूस होने लगा था की वो जो गहराई झलकनी चाहिए थी, वो कहीं दबी सी थी। तो मैंने अपने कुछ मित्रों से बात की, उन्हे कविता सुनने का आग्रह किया ताकि वो मुझे बता सकें की मेरी गाड़ी में स्पीड ब्रैकर कहाँ लगा था। उनका सुझाव मुझे बहुत ही उचित लगा। वे बोली कि, “कुछ अच्छे लेखकों को पढ़ो, उनके भाव को समझो और खयालों में उनसे मिल आओ, जाओ।


मैंने एक दम ऐसा ही किया और मैं अपनी पहली किताब घर ले आई। शायद ही मैं जानती थी की ये केवल किताब नहीं थी। किसी के अस्तित्व की, किसी के व्यक्तित्व की, किसी के समूचे संसार का आईना थी। और उस दिन से ये मोहतरमामेरी रूह में बस गई। इनका नाम है अमृता प्रीतम। और कुछ दिन पहले इनका जन्म दिवस था। 

आप जानते है मैंने आज इनके बारे में लिखने का क्यों सोचा? क्योंकि अमृता वो शख्सियत है जिनके होने का हमजितना सत्कार, स्वागत और अभिनंदन करें उतना कम है। उनकी लेखनी से निकले कईं नायाब रचनाओं ने देश के साहित्यको चार चाँद लगा दिए। पर उनके लेखन से भी ज्यादा मुझे उनका जीवन प्रेरित करता है।

उनका पूरा जीवन इश्क से, इश्क में और इश्क के लिए ही था। ऐसा लगता था मानो कुदरत ने इश्क के बहते चश्मे कोइंसानी रूप में ढाल दिया हो। एक ऐसी रूह जीसे कोई रिश्ता, कोई रिवाज, कोई समाज अपनी शर्तों में नहीं बांध सकताथा। वो आजाद रूह थी, जो वहाँ बसती थी जहां इश्क का नूर बसता था, जहां प्रेम के किस्से बसते थे, जहां कविताएँ औररंगों की महक बसती थी। 

अमृता की रचनाएँ अगर आप पढ़ेंगे तो समझेंगे की, अगर कुछ कर गुजरने की चाह अगर प्रबल हो तो रास्ते खुद-ब-खुदबन जाते है। उनके स्वच्छंद लेखन को काफी बार आलोचकों का सामना करना पड़ा लेकिन अमृता का हौसला कभी कम नहीं हुआ और न ही उनके लिखने का अंदाज ही बदला।

उनकी रचनाए दिल से होकर रूह को छु जाती हैं। औरत के मन से जुड़े हर पहलू को अमृता ने बेहद खूबसूरती से अपने शब्दों में तराशा है। बस इतना ही नहीं, उन्होंने सामाजिक रूढ़ियों और कुरीतियों के विरोध में भी कईं लेख लिखे जिनके कारण वे उन समुदायों के प्रश्नों के घेरे में भीघिरी रही। लेकिन अमृता तो बादल है, जिन्हे थमना नहीं आता। उनकी रचनाओं से उन्हे इतनी प्रसिद्धि मिली की वियतनाम के राष्ट्रपति हो ची मिन्ह ने अमृता का माथा चूमते हुए कहा, हम
दोनों सिपाही हैं. तुम कलम से लड़ती हो, मैं तलवार से लड़ता हूँ. ऐसे ही न जाने कितने अन्तराष्ट्रिय पुरस्कारों से अमृता को सम्मानित किया जा चुका है।


अमृता प्रीतम, ये केवल नाम नहीं है, ये वो लहर है जो आज जवानों में कविता बन कर बसती है, ये वो लौ है जिसकी रोशनी के न जाने कितने मुशायरों को रोशन किया है, ये वो एहसास है जीसे न जाने कितने ही इशक़ज़ादों ने महसूस किया है और ये वो रास्ता है जिस पर हर मोहब्बत करने वाला जरूर चल कर आता है। और अंत में श्रद्धांजलि के ररोप में उनकी कही कुछ पंक्तियाँ जिनमे स्त्री से जुड़ी उनकी भावनाएँ व्यक्त होती हैं। 

स्त्री तो खुद डूब जाने को तैयार रहत
समंदर अगर उसकी पसंद का हो 

इसी के साथ इस लेख को यहीं विराम देते हुए आपसे अलविदा लेती हूँ। अगले दफा फिर मिलएगे किसी नए किस्से के साथ, तब तक के लिए खुश रहिए और प्यार बाँटिए।

Author: Charu Rajpal Publisher: Kosha Life

 

 

Leave a comment

All comments are moderated before being published

"Unshakeable health comes first from taking responsibility for your happiness & peace. Everything else is secondary"

Anirudh Gomber