क्या आप सही मायने में आजाद हैं?

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प्यारे दोस्तों,

आज आप सबसे एक और दिल की बात साँझ करने जा रही हूँ। पर चलिए पहले ये जान लेते है की आप का ये ब्लॉग हिन्दी में क्यों है?

आप सबने मेरे किस्से तो पढे ही है, इसलिए आप सब मेरी बेटी को भी जानते ही हैं। तो हुआ यूं की कुछ दिन पहले मेरी बेटी की हिन्दी की परीक्षा का रिजल्ट आया। वो मायूस थी क्योंकि उसके अंक कुछ खास अच्छे नहीं आए थे।

मैंने उसे पुचकार कर पूछा की हिन्दी अच्छी नहीं लगती क्या? इस सवाल पर मिले जवाब ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया।

वो बोली, “ माँ! मुझे कभी-कभी तो लगता ही नहीं है की मैं भारतीय हूँ। आप और स्कूल के अध्यापक हम बच्चों को दोष देते है पर आप ही बताइए की हम हिन्दी सीखें तो कहाँ से? उसके अनुसार स्कूल में केवल हिन्दी कक्षा में ही हिन्दी बोलने की अनुमति थी। उसके अलावा किसी भी कक्षा में हिन्दी बोले जाने पर बच्चों को दंड मिलता है। वहीं घर में भी ये होड़ लगी है की पैदा होते बच्चे को ही अंग्रेजी में पीएचडी करवा दी जाए। 

उसके इन शब्दों ने मुझे मानो मजबूर कर दिया ये सोचने पर कि कागजी तोर पर तो हम स्वतंत्र हो गए पर मानसिक तोर पर आज भी हम पाश्चात्य सभ्यता के गुलाम ही बने है। मैं किसी भी भाषा के प्रयोग के खिलाफ नहीं हूँ पर क्या हमारी मात्रभाषा को उचित सम्मान नहीं मिलना चाहिए? बस यही सोच कर मैं आज और आने वाले कईं ब्लॉग हिन्दी में ही लिखूँगी।

आइए अब मुद्दे पर आते है। अगस्त का महीना शुरू होते ही बाजार तिरंगे झंडों से भर जाते हैं। कुछ दस दिनों के लिए अचानक हवा में भी देशभक्ति की महक आने लगती है। और फिर 15 अगस्त के दिन तो लगता है मानो हम सब instagram और social media पर ही स्वतंत्रता दिवस मना रहे हों। लेकिन मेरा सवाल ये है की क्या हम सच में आजाद हैं?

अब आप कहेंगे की ये क्या पागलों वाला सवाल है? लेकिन जरा सोच कर देखिए, की क्या हम अभी भी “क्या कहेंगे लोग” के जनज्जाल में नहीं फंसे हैं? खुद से पूछिए की आखिरी बार सब भूल कर खुद के साथ समय कब बिताया था आपने? वो पुराना गिटार जिसे सीखने के जुनून से खरीद कर लाए थे, क्यों नहीं सीख पाए अभी तक? पूछिए की क्या मौत के डर  को जीत कर पहाड़ों के टेड़े मेडे रास्तों पर स्कूटी चलाने का वो मौका क्यों जाने दिया हाथ से? 

जरा सोचिए की हर दिन अपनी कितनी अधूरी इच्छाओं की कब्र पर आप एक झूठ का महल खड़ा करते हैं। और आप इन लाशों का बोझ ढोये, तमाम बंधनों में बंधे खुद को आजाद कहते है। तो क्यू न आज वो पहला कदम उठाएँ अपनी आजादी की तरफ, जहां हम जब सांस से तो उसे महसूस करने के लिए दो पल रुक सकें। की अगर गाना गाते हुए सुर बिगड़ भी जाए तो भी वो सुर से भरा हो। की अगर आज मुझे बारिश के पानी में कागज़ की नाव चलाने का मन हो तो अपने उम्र के साल न याद आये।

मैं जानती हूँ की दूरी सिर्फ पहले कदम की ही है, तो आज जो टूट ख्वाब दिल में टीस बन कर बैठ गया है ना, उसे पूरा करने के लिए उठा लो ये कदम, बह जाने दो दर्द को खुद के भीतर से.. तो फिर तुम्हारी रूह की आवाज तुमसे कहेगी, की अब तुम आजाद हो।

   मुझे विश्वास है की तुम चुनोगे अपनी आजादी, बोलो चुनोगे ना? 

चारु राजपाल

Author: Charu Rajpal | Publisher: Kosha Life

 

 

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Anirudh Gomber